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ईशमधु तलवार जयंती

जीवन की दुर्गम राहों में, तुम चलते रहते थे !
तेरी छाया में ऐ! तरुवर, पुष्प पला करते थे। 
घुप्प अंधेरों की महफ़िल में 
रात चांदनी मुश्किल थी,
राह  कटे बेखौफ तभी, 
किस्सों के दीप जलाया करते थे। 
जीवन की दुर्गम राहों में, तुम चलते रहते थे !

चुप्पी नहीं, बोलना होगा 
नहीं बैठना, चलना होगा, 
खड़े सवालों के घेरों को 
राहों के तुम अवरोधों को, ठोकर मार गिराते  थे, 
जीवन की दुर्गम राहों में, तुम चलते रहते थे !

एक कोना तय अपना था 
कौन जानता था हमको 
नाम दिया पहचान मिली
साथ तुम्हारा पाकर के। 
भूले हम थे अनजाने, 
तुम हाथ हर इक सर धरते थे। 
जीवन की दुर्गम राहों में, तुम चलते रहते थे !

राह बहुत बाकी थी राही 
 इतनी भी क्या जल्दी थी, 
 तेरी शब्दों की ताकत से 
 हिम सी पीर पिघलती थी,
 रुक गए तुम , 
तुम्हारे आगे दंभ और आलस कहाँ ठहरते थे 
जीवन की दुर्गम राहों में, तुम चलते रहते थे !
सुनीता बिश्नोलिया

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