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पर्यावरण

हरी-भरी धरती रहे,नीला हो आकाश,
स्वच्छ बहे सरिता सभी,स्वच्छ सूर्य प्रकाश।।

पेड़ों को मत काटिए,करें धरा श्रृंगार।
माटी को ये बांधते,ये जीवन आधार।।

वन के जीव बचाइये,रखते धरती शुद्ध।
अपने ही अस्तित्व को, करते हमसे युद्ध।।

शुद्ध हवा में साँस लें,कोई न काटे पेड़।
आस-पास भी साफ़ हो, सभी बचाएँ पेड़।।

धरती माता ने दिए,हमें अतुल भण्डार,
स्वच्छ पर्यावरण रखें, मानें हम उपकार।।

कानन-नग-नदियाँ सभी,धरती के श्रृंगार। 
दोहन इनका कम करें,मानें सब उपहार।। 

साफ-स्वच्छ गर नीर हो,नहीं करें गर व्यर्थ।
कोख न सूखे मात की, जल से रहें समर्थ।

धूल-धुआँ गुब्बार ही,दिखते चारों ओर।
दूषित-पर्यावरण हुआ,चले न कोई जोर।।

कान फाड़ते ढोल हैं,फूहड़ बजते गीत,
हद से ज्यादा शोर है,खोये मधुरिम गीत।

हरी-भरी खुशहाली के,धरती भूली गीत।
मैली सी वसुधा हुई,भूली सुर संगीत।।

पर्यावरण स्वच्छ राखिये,ये जीवन आधार,
खुद से करते प्यार हम,कीजे इससे प्यार।
सुनीता बिश्नोलिया

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