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हिंदी दिवस - मेरी पहचान हिंदी

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कठपुतली

                         प्रेम के धागे में बंधी        थिरकती रही         हर ताल पर।         मेरा संसार थे तुम         और तुम्हारी         उँगलियों से छोड़ी        ढील का सीमित दायरा।         धागे के खिंचाव और         इशारों पर नचाते         मीठे बोलों ने        तुम्हारी तय की हुई         हद में रखा मुझे..!        सागर के हृदय पर         मचलती लहरों को देखकर        जाना         प्रेम नाम बंधन का नहीं..!           और याद कर         अपना अस्तित्व         तोड़ दिए बंधन के धागे।         हाँ.. साथ रहूँगी सदा         पर....        तुम्हारे प्रेम में नाचती         कठपुतली बनकर नहीं।        किनारों से बाहर बहती         लहरों सी।          सुनीता बिश्नोलिया                                                                     

हिंदी प्रेम

 हिंदी प्रेम   रविवार का दिन था फिर भी सुमित्रा खोई हुई थी अपनी किताबों में।    पर रोज की तरह आज वो किताबें पढ़ नहीं रही बल्कि उन्हें अपनी लाइब्रेरी में करीने से रख रही थी ।साथ ही बेटे के दोस्त रवि को उसके एन.जो.ओ की लाइब्रेरी में देने के लिए कहानियों एवं व्याकरण की कुछ किताबें अलग-अलग दो कार्टूनों में रख रही थी ।      तभी दरवाज़े की घंटी बज उठी तो सुमित्रा ने   सोचा - "कौन हो सकता है..? रवि तो शाम को चार बजे आने वाला था।" सोचते हुए सुमित्रा ने दरवाज़ा खोला तो बाहर खड़े लोगों को  पहचानने को कोशिश करने लगी। तभी उनमें से लगभग चालीस वर्षीय व्यक्ति ने उन्हें आगे बढ़कर नमस्कार करते हुए कहा - "नमस्कार मैम... पहचाना मुझे   उसकी बोली सुनते ही जैसे सुमित्रा को सब याद आ गया और वो बोली -" अभय ! कैसे भूल सकती हूँ तुम्हें! "  " मैम मैं भी आपको हर रोज याद करता हूँ।"  ये सुनकर सुमित्रा ने मुस्कुराकर कहा -"सुना है बहुत बड़ी कंपनी में काम कर रहे हो आजकल।   सुमित्रा की बात के जवाब में अभय ने बहुत ही विनम्रता से कहा -" आपकी शिक्षा और संस्कार ही मेरी

सूर्योदय - झीलों की नगरी उदयपुर

 रमा मेहता ट्रस्ट द्वारा आयोजित तीन दिवसीय 'कहानी लेखन' 'कार्यशाला' के तहत पिछले महीने झीलों की नगरी उदयपुर जाना हुआ।       झीलों की नगरी में सबसे पहले बात करुँगी  बड़गाँव स्थित 'कृषि विज्ञान केंद्र' की जहाँ हमें ठहराया गया। शहर के फ्लैटों से निकलकर कृषि विज्ञान केंद्र के हरे-भरे प्रांगण में पहुंचकर लगा जैसे हम स्वर्ग में आ गई। अरावली पर्वत शृंखला से घिरे वहाँ के हरितिम वातावरण को देख हमारे हृदय में बचपन हिलोरें लेने लगा लगा।     मैं, शिवानी और तारावती सुबह उगते सूरज के साथ खिलखिलाती तो संध्या के सूरज को पकड़कर डूबने से रोकती।      हम तीनों अलसुबह चाय  का कप उठाकर सीधे कृषि भवन की छत पर जा बैठती। जिधर भी नज़र घुमाओ हर तरफ़ हरी-भरी पहाडियाँ और इन्हीं हरीतिम पहाड़ियों के बीच दूर से दिखाई देती महाराणा प्रताप की बड़ी सी मूर्ति जैसे हमें अपने पास बुला रही हो।   चिड़ियों की चहचहाहट,सुग्गे के स्वर और मोर की मीठी बोली सुनकर हृदय के तार-तार से स्वर लहरी फूट पड़ती और आँखों के आगे बचपन की यादें चित्रवत चलने लगती और अभिशप्त सी

खिलखिला उठे ज़िंदगी - वट वृक्ष

खिलखिला उठे ज़िंदगी - वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय श्याम जांगिड़ कहते हैं  ‘‘माँ..सुनो, सुनती क्यों नहीं माँ । मुझसे कैसी नाराजगी है बताओ ना।  अब तक तुम्हारे अमृत से ही जिन्दा हूँ माँ! पर कब तक रहूंगा जिंदा तुम्हारे प्रेम के अमृत की मीठी धार के बिना।  हाँ! सूखते जा रहे हैं तुम्हारे हृदय में स्थित अमृत के अतुलित भंडार । चाहे मेरी उम्र हजार साल भी हो जाए  फिर भी तुम्हारे अंक में खुद को बच्चा ही समझता रहूँगा। तुम्हारे आँचल की ओट में छिपकर बंद कर लेना चाहता हूँ अपनी आँखें। अब नहीं देख सकता इस दुनिया का दर्द।  हर तरफ जलती चिताएं,चीख-पुकार,हाहाकार, मनुष्य का करुण क्रंदन। इन सूखते जल स्रोतों के बीच भी तुम्हारे हृदय से चिपककर मैं महसूस कर सकता हूँ तुम्हारे वात्सल्य की उष्मा।     तुम्हारी तेज चलती साँसे और हृदय में हो रही उथल-पुथल नहीं छिपी है मुझसे!       तुम ही बताओ माँ! तुम्हारा ये बूढ़ा बेटा कैसे बचाए इंसानों को।   बहुत सजा सह चुका इंसान बस अब नहीं। नहे ईश्वर! मैं कर ही क्या सकता हूँ रोने के अलावा…।   अरे! लाल फूलों से लदे मेरे नन्हें गुड़हल मेरे  रोने पर इतना विस्मय ना करो ।     पूछ

माटी री सोरम

माटी री सोरम   लिखूं कविता म्हारै गांव री  मुखड़े पै मुस्कान रवैली माटी री सोरम माटी री  काना  बातां आप कैवैली  बातां ऊँची हेल्यां री बै  साथी संग सहेलियाँ री वै  गिणिया करती बैठी तारा भोली बातां पहल्यां री बै गळी-कूंचळ्यां री बातां नै लिखतां आँख्यां खूब बवैली माटी री सोरम माटी री  काना  बातां आप कैवैली।    गुड्डी-गुड्डा ताळ-तळाई ईसर-गोरां खूब जिमाई खेल-खिलौणा बाळ पणै रा   किस्सा है ये अपणैपण रा  रेतीला धोरां री बातां  हाल तकै तो और हुवैली   माटी री सोरम माटी री  काना  बातां आप कैवैली।  तीज-तिवारां ब्याव-सगाई बन्ना-बन्नी म्है बी गाई घूघरिया घमकाया करती म्हारै गाँव  री बूढी ताई भूल्या-बिसर्या गीतां री हिवड़ै सूं रस धार बवैली माटी री सोरम माटी री  काना  बातां आप कैवैली।।  जिण टीबां पै लोट्या करता इण आँख्यां सूं देख्या मरता देख सिमटता गाँव-गळ्यां नै झर-झर-झर-झर आँसू  झरता नई मंजिलां रै सामी पण बूढी हेल्यां खड़ी रैवैली माटी री सोरम माटी री  काना  बातां आप कैवैली।।

सांस्कृतिक – झरोखा बाबा रामदेवजी

बाबा रामदेव जयंती पर आदरणीय डॉ आईदानसिंह भाटी द्वारा दी गई बहुत ही सुंदर और विस्तृत जानकारी  सांस्कृतिक – झरोखा                  बाबा रामदेवजी   बाबा रामदेवजी का अवतरण विक्रम स. 1409 में हुआ | चैत्र सुदी पञ्चमी सोमवार को इनका जन्म हुआ था, किन्तु लोक मानस में भाद्रपद सुदी दि्वतीया ‘बाबा री बीज’ के नाम से ख्यात है|  बाबा रामदेवजी मध्यकाल की अराजकता में मानवीय मूल्यों के लिए संघर्ष करने वाले अद्भुत करुणा पुरुष हैं| उनके पूर्वजों का दिल्ली पर शासन था | तंवर अनंगपाल दिल्ली के अंतिम तंवर (तंवर, तुंवर अथवा तोमर एक ही शब्द के विभिन्न रूप हैं) सम्राट थे | वे दिल्ली छोड़कर ‘नराणा’ गाँव में आकर रहने लगे जो वर्तमान समय में जयपुर जिले में स्थित है | इसी के आसपास का क्षेत्र आजकल ‘तंवरावटी’ कहलाता है | दिल्ली के शासक निरंतर तंवरों पर हमले करते रहते थे, क्योंकि वे जानते थे कि दिल्ली के असली हकदार तंवर हैं| इसलिए तंवर रणसी अथवा रिणसी के पुत्र अजैसी  (अजमाल) को वंश बचाने की समझदारी के तहत मारवाड़ की तरफ भेज दिया | वे वर्तमान बाड़मेर जिले की शिव तहसील के ‘उँडू – काशमीर’ गाँव के पश्चि